जिस तरह बृजेश पाठक होना आसान नहीं, उसी तरह मेडिकल कॉलेज के ट्रामा सेंटर में इलाज कराना भी आसान नहीं

लखनऊ (डॉ मोहम्मद कामरान)। उत्तर प्रदेश के हर कोने से आने वाले मरीजों और उनके तीमारदारों के लिए बदहाली, और अव्यवस्था का अंबार है ट्रामा सेंटर, डॉक्टरों की दिन रात की मेहनत से शोहरत तो चारों दिशाओं में है ट्रामा सेंटर की लेकिन असीमित संसाधनों के रहते भी तीमारदारों के लिए बड़ा सरदर्द है ट्रामा सेंटर का ट्रामा, मुख्यमंत्री योगी जी के प्रदेश गोरखपुर और प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से आने वाले रोगियों की कमी नही है वही यहां आने के बाद एक कोने से दूसरे कोने तक दौड़ते तीमारदार, एक खिड़की से दूसरी खिड़की तक दौड़ाने की ऐसी प्रक्रिया लागू है जो रोगियों के साथ आये तीमारदारों को रोगी बना देती है।

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अगर जनप्रतिनिधियों के लिए विधानसभा पेपरलेस किया जा सकता है तो ट्रॉमा सेंटर पर एकल व्यवस्था भी लागू की जा सकती है, खून की जांच के लिए बने कमरा 21 में मंत्रीजी चाहे जिस रूप में जाएं प्रवेश ही नही कर पाएंगे, 100 स्ट्रेचर की व्यवस्था है ट्रामा में लेकिन उसमें अनेक स्ट्रेचर ऐसी है जिसमे आर पार देखने के साथ साथ सेप्टिक की व्यवस्था मुफ़्त में लागू है, जंग लगे लोहे के टुकड़े किसी भी रोगी के शरीर को एक नई मुसीबत में डालने के लिए हरदम तैय्यार है, सावधानी हटी और एक नई मुसीबत गले लग जाती है।

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ट्रॉमा का जन सम्पर्क कार्यालय मठाधीशों का अड्डा मात्र नज़र आता है और पैथोलॉजी और प्राइवेट नर्सिंग होम के दलालों का सारा जुगाड़ तंत्र यही से संचालित दिखता है जिसमें जन सम्पर्क तो नही अक्सर बाहरी व्यक्तियों का जमावड़ा ही लगा रहता है। मंत्रीजी कुछ वक़्त तो दीजिये ट्रॉमा सेंटर की बदहाली को, ज़िंदगी भर की दुआ मिलेगी तीमारदारों के दिल से।

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