भ्रष्टाचार की गंगा में पत्रकारों ने भी लगाईं डुबकियां ?

अविनाश पाण्डेय। प्रख्यात पत्रकार अरुण शौरी ने कहा था कि सफल पत्रकार वह है जिसके पास सबसे अधिक संपर्क सूत्र हैं, भाई लोगों ने संपर्क सूत्र बढ़ाए लेकिन न्यूज के लिए नहीं, निजी हित के लिए। आखिर अब पत्रकार भी व्यवस्था के अंग हैं। कारपोरेट युग के दौर में अधिकांश पत्रकारों की मजबूरी होती है कि वह संस्थान के लिए लाइजिनिंग करे या उन मुद्दों पर चुप्पी साध ले, जिनसे सत्ता या संस्थान को नुकसान पहुंच रहा हो। कोरपोरेट जर्नलिज्म का एक और नुकसान हुआ है कि अधिकांश पत्रकार स्वार्थी हो गये। संस्थान हित के साथ ही साथ स्वहित भी साधने लगे हैं। ऐसे में मिशनरी पत्रकारिता का दावा करना बेमानी है।

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विधानसभा भर्ती प्रकरण में पांच पत्रकारों के नाम सामने आ रहे हैं। हालांकि मैं यह भी बता देना चाहता हूं कि इस प्रकरण में कुछ भी नहीं होगा। सब यथावत रहेगा। क्योंकि भाजपा और कांग्रेस के हर प्रभावी नेता की इस घोटाले में संलिप्तता है। ऐसे में जब सब नंगे हो रहे हैं तो पत्रकार बिरादरी घूंघट ओढ़े क्यों रहे? लाज-शर्म और नैतिकता का युग बीत चुका है। हालांकि यदि इन पत्रकारों के रिश्तेदारों का चयन नियमानुसार हुआ है या यह बात झूठ है कि उनके रिश्तेदार विधानसभा में बैक डोर से भर्ती किये गये हैं तो मैं इन पत्रकारों के समर्थन में अडिग खड़ा हूं। मुख्यधारा के अखबार इतने बड़े प्रकरण को फ्रंट पेज की बजाए अंदर धकेल रहे हैं। यानी राजू या बड़ोनी का निलंबन उनके लिए फ्रंट पेज की न्यूज है लेकिन विधानसभा भर्ती घोटाले को दबाने की पुरजोर कोशिश हो रही है। इसका राज इस बात में भी छिपा हो सकता है कि कुछ हमारे पत्रकार साथी भी भ्रष्टाचार की गंगा में डुबकियां लगा चुके हैं।

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पत्रकारों में एक बड़ा नाम विकास धूलिया का सामने आ रहा है। दैनिक जागरण में कार्यरत विकास पर अपने भाई को विधानसभा में नौकरी दिलाने का आरोप है। हिन्दुस्तान से रवि नेगी की पत्नी, पर्वतजन के शिव प्रसाद सेमवाल की पत्नी, इलेक्ट्रानिक मीडिया से जुड़े फईम तन्हा भी विधानसभा में नौकरी मिलने के आरोप हैं। इसके अलावा कई अन्य पत्रकार भी हैं। हिन्दुस्तान के पत्रकार चंद्रशेखर बुडाकोटी का नाम भी पूर्व शिक्षा मंत्री अरविंद पांडे द्वारा अशासकीय स्कूलों में की गयी भर्तियों में उछल रहा है। आरोप है कि उनकी पत्नी को पांडे ने नियुक्ति दी है।

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मुझे लगता है कि इन पत्रकारों को सामने आकर यह तथ्य झुठलाने चाहिए ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके। कुछ पत्रकारों की आड़ में सब पत्रकार क्यों गाली खाएं? उम्मीद है कि पत्रकारों की संलिप्तता के मामले में स्पष्टीकरण आएगा।

दीपक उपाध्याय अपना नाम इस प्रकरण में आने से व्यथित है। उसका कहना है कि उसका कोई परिजन इस प्रकरण में शामिल नहीं है उसकी भावनाओं को मैंने ठेस पहुंचाई है। इसके लिए मुझे खेद है। मैंने पोस्ट में स्पष्ट कहा है कि यदि और भी पत्रकार साथी इस प्रकरण में नहीं हैं। तो मैं उनके बयान को पोस्ट पर लिखूंगा और खेद प्रकट करूंगा। इसमें मुझे आत्मिक संतोष होगा कि मेरे साथी साफ छवि के हैं।

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