साल वृक्ष की रखवाली के लिए जंगल में रहने वाले बस्तर के युवा आदिवासी

तीन दशक पहले तक मचकोट गांव में बाघ का आतंक फैला हुआ था। लेकिन अब यह बात पुरानी हो चुकी है। साल के पेड़ों की रखवाली के लिए गांव के युवक अपने दिन-रात जंगल में ही घूम-घूम कर बिता रहे हैं।

बस्तर : छत्तीसगढ़ के बस्तर में मचकोट गांव के घने साल के जंगलों के बीच बांस की एक छोटी सी झोपड़ी है। इसके अंदर कमलू बघेल लकड़ी की चारपाई पर बैठे हुए है। वहीं साथ में एक ढेर के ऊपर कंबल पड़ा है और मच्छरदानी ऊपर की तरफ मुड़ी हुई है। लेकिन यह कमलू का घर नहीं है। यह तो वो जगह है जहां हर रात काम से लौट कर आने के बाद वह आराम करता है। यहीं चारपाई के बगल में रखी मेज पर मसालों के पैकेट, प्लास्टिक की पानी की बोतलें, स्टील के कुछ बर्तन और सहजन की जड़ के तीन टुकड़े रखे है। इससे बनी सब्जी कमलू और उसके साथियों के लिए रात का खाना होगी.

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कमलू और दर्जनभर अन्य युवक वन प्रबंधन समिति और संयुक्त वन प्रबंधन समिति (जेएफएमसी) के सदस्य हैं। वे सभी मचकोट गांव के इस शिविर में एक साथ रहते हैं और बहुमूल्य साल वृक्षों की रखवाली करते हैं। इस समिति को 1999 में पंजीकृत किया गया था। धारीदार कमीज और निक्कर पहने 20 वर्षीय कमलू की उम्र भी लगभग इस समिति जितनी ही है.

कमलू निश्चित रूप से यह याद करने के लिए बहुत छोटा है कि 90 के दशक के मध्य में किस प्रकार बाघों ने छत्तीसगढ़-ओडिशा सीमा के वनों में बसे उसके गांव को आतंकित किया हुआ था। लेकिन आज वह बड़ी ही बहादुरी से जंगल में गश्त लगाता है और आसपास के इलाकों को शिकारियों, लकड़ी चोरों और ज़बरदस्ती जमीन पर कब्जा करने वालों से सुरक्षित रखता है। पिछली पीढ़ी के लिए ऐसा करना सोच से परे था।

बाघ का आतंक
52 साल के धर्मदास बघेल उस समय सिर्फ 25 साल के थे, जब उनकी पत्नी के बड़े भाई को जंगल में बाघ ने मार दिया था। तब सरकार ने मुआवजे के रूप में परिवार को 25,000 रूपये दिए थे। एक बुजुर्ग महिला को बाघ ने तब मार दिया था जब वह पत्ते इकट्टा करने जंगल गई थी। एक अन्य महिला को बाघ उसके घर से उठाकर ले गया था। 15 किमी दूर पड़ोसी गांव तिरिया में बाघ के हमले में दो लोगों की मौत हो गई थी।

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धर्मदास बघेल कहते है कि साल वनों के संरक्षण के लिए गांव के युवा विभाग के साथ मिलकर बेहतरीन कार्य कर रहे हैं। बाघों के कारण मचकोट गांव में पहले हुई दो मौतों के बाद लोगों के लिए जलाने के लिए लकड़ियां इक्ट्ठा करना भी बड़ा मुश्किल काम हो गया था।
धर्मदास याद करते हुए कहते हैं कि उस समय बाघों के आतंक की घटना जंगल में आग की तरह फैल गई थी। लोग जंगल में सिर्फ ग्रुप बनाकर जाया करते थे। बाघों को डराने के लिए वह जोर-जोर से ड्रम बजाए जाते थे। बाघ के डर से रात में घर के सभी खिड़की-दरवाजे अच्छे से बंद कर दिये जाते थे। आखिर में इस मामले से निपटने के लिए वन विभाग आगे आया। उन्होंने कुछ विशेषज्ञ नियुक्ति किए, जिन्होंने चार वयस्क बाघ और दो बाघ के बच्चों को पकड़कर मध्य प्रदेश के बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान में भेज दिया।

वन विभाग के डिप्टी रेंजर, जुगदार बघेल इस घटना को याद करते हुए कहते हैं कि पकड़े जाने से पहले तिरिया के मचकोट इलाके में इन बाघों ने करीब 16 लोगों को मार डाला था। उन दिनों जंगल काफी घने थे और पक्की सड़कें भी नहीं थीं। मचकोट और तिरिया के आसपास सिर्फ बैलगाड़ियां चलती थी।

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आज मचकोट गांव भी देश को राजस्व दे रहा है। सन् 2017 से यहां साफ, पक्की सड़कें और पक्के मकान हैं। यहां पाइप लाइन से पानी की आपूर्ति हो रही है। गांव में विकास की शुरुआत मुख्य रूप से लकड़ी से होने वाले मुनाफे के कारण हुई। लकड़ी के लिए वनों की अवैध कटाई को रोकने के लिए ही कमलू जैसे युवक प्रयास कर रहे हैं।

साल की लकड़ी से हुआ मुनाफा
साल के जंगलों से अच्छी गुणवत्ता वाली लकड़ी मिलती है। मचकोट निवासी गणेशराम बघेल ने बताया कि दस वर्षीय योजना के अनुसार वन के 12 हिस्सों में वृक्षों की कटाई की जाती है। सन् 2003 और 2021 के बीच जंगल के 4,118 हेक्टेयर हिस्से से लगभग 3 करोड़ रुपये की कमाई हुई है। मचकोट से 12 किमी दूर धनपुनजी कार्यालय में तैनात वन रेंजर बुधसन बघेल ने कहा, जब भी बस्तर के सरगीपाल डिपो में पेड़ों को काटकर नीलाम किया जाता है तो बिक्री से मिलने वाली आय का 15 प्रतिशत समिति के खाते में जमा होता है।”
गणेशराम ने कहा,” जब हमें लकड़ी की बिक्री से होने वाले मुनाफ़े का एक हिस्सा मिलने लगा तो हम गांव का विकास करने में सक्षम होने लगे। विकास का यह काम 2007 से शुरू हुआ। तब मिट्टी के घरों को गिरा कर नए घर बनाए गए।”
मचकोट वन समिति 1999 में पंजीकृत हुई थी। मुनाफ़े से मिलने पैसों से गांव में काफी विकास हुआ है।
इन पक्के घरों से लगभग एक किलोमीटर दूर वह ‘शिविर’ हैं जहां कमलू और उसके जैसे कुछ और युवा एक साथ रहते हैं। वे साथ में काम करते हैं, खाना बनाते और खाते हैं और वहीं साथ में सोते भी हैं। इन शिविरों में रहकर वे साल के पेड़ों को काटने की कोशिश करने वाले तस्करों पर नजर रखते हैं।

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शिविर से लगभग 25-30 मिनट की दूरी पर हमें कांटेदार तार की बाड़ दिखाई दी। यह इस बात का संकेत था कि छत्तीसगढ़ की सीमा यहां खत्म होती है। बाड़ के दूसरी तरफ भी एक शिविर दिखा जो ओडिशा के कोरापुट ज़िले के अंतर्गत आता है।
मचकोट निवासी कमलू बघेल इसी जगह पर रहते हैं और वन संपदा पर कड़ी नज़र रखते हैं।

यहां कोरापुट के मलचमल गांव निवासी तुलसीराम धुरवा और उनके दो साथी-लक्ष्मण धुरवा और गुरुदास धुरवा पहरा दे रहे हैं। दो साल पहले मचकोट समिति ने इन्हें ओडिशा के जंगलों से अतिक्रमण करने वालों के प्रवेश को रोकने के लिए नियुक्त किया था। सीमा के दोनों तरफ तैनात इन कुल 20 युवकों को वन विभाग की तरफ से हर महीने 5,000 रुपए तनख्वाह मिलती है। वन पर नज़र रखने के लिए विभाग अपने लोगों को भी यहां नियुक्त करता है।

अपने दिन की शुरुआत 4000 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले जंगल में गश्त लगाकर करते हैं। इस बीच खाना खाने के लिए वे एक छोटा सा ब्रेक लेते हैं और फिर वापस गश्त लगाने में जुट जाते हैं। गश्त लगाने का काम दोपहर देर तक चलता है। इसके बाद देर शाम वे सभी शिविर में लौटते हैं और चावल, दाल और सब्जियों वाला सादा खाना खाकर बातचीत में लग जाते हैं. नहाने के लिए पास ही में एक तालाब हैं और राशन खत्म होने पर उन्हें गांव की ओर रुख करना होता है.

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उप वन रेंजर जुगदार बघेल ने कहा कि यहां से 173 किमी दूर सुकमा ज़िले से लोग जंगलों में अंदर की तरफ आते हैं और तिरिया-मचकोट रेंज में जंगल के कुछ हिस्से को साफ करके उसमें फसल उगाना शुरू कर देते हैं। कमलू और उनकी टीम के सदस्य इस तरह की गतिविधियों पर भी अपनी नज़र बनाए रखते हैं। वे कहते हैं कि उनकी सक्रिय भागीदारी के बाद से पेड़ों की अवैध कटाई में काफी कमी आई है। वन विभाग के अनुसार छत्तीसगढ़ में 7,887 संयुक्त वन प्रबंधन समिति हैं, जो 33,19,000 हेक्टेयर वन क्षेत्र में काम कर रही हैं।

भुवनेश्वर में रहने वाले स्वतंत्र शोधकर्ता तुषार दास कहते हैं, “वन अधिकार अधिनियम 2006 के बाद जेएमएफसी वैध नहीं हैं। उन्हें भंग कर दिया जाना चाहिए।” इन समितियों का गठन वन विभाग करता है। विभाग के अधिकारी ही कार्य योजना और वित्तीय मामलों की देख-रेख करते हैं। वह आगे कहते हैं,” संयुक्त वन समितियां वन विभाग के विस्तार के रूप में काम करती हैं और ज़्यादातर मामलों में समुदाय के वन अधिकारों को कमज़ोर करती हैं।” एक सरकारी अधिकारी जो अपनी पहचान सामने नहीं लाना चाहते, बताते हैं, “एक तरफ जहां ओडिशा और छत्तीसगढ़ राज्यों में बड़ी संख्या में जेएमएफसी काम कर रही हैं, वहीं छत्तीसगढ़ में समुदायों द्वारा चलाई जा रही एफआरसी की संख्या भी लगातार बढ़ रही है, जो अभी लगभग 3,800 के आसपास है।

101 रिपोरर्ट्स से बातचीत करते हुए अभी हाल तक बस्तर की ज़िला वन अधिकारी रहीं स्टाइलो मंडावी ने कहा कि संयुक्त वन प्रबंधन समितियों को वन अधिकार समितियों या एफआरसी में विलय होना था। वह कहती हैं, “दोनों समितियां अभी तक अलग-अलग ही हैं। भविष्य में इनके मिलकर एक होने की संभावना है। हमें कुल 642 एफआरसी तैयार करनी हैं, लेकिन अभी तक केवल 193 एफआरसी ही मौजूद हैं।”

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मुख्यमंत्री कार्यालय में एफआरए और पेसा (पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों का विस्तार) अधिनियम) के समन्वयक प्रखर जैन ने कहा, “वनों की तरह के जो सार्वजनिक संसाधन है उन्हें नियंत्रित करने का काम ग्राम सभा का होना चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि जेएफएमसी को मिलें हुए क्षेत्र और उन्हें मिलने वाले मुनाफे का कोई हिसाब नहीं है।”

मचकोट में बाघों के हमलों पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि इन जानवरों के प्राकृतिक आवास के साथ छेड़छाड़ करने, पेड़ों को काटने और लकड़ियों की तस्करी के कारण शायद वे गांव में घुस आए होंगे। अगर वनों की देखरेख का ज़िम्मा ग्राम सभा के पास होता तो शायद ऐसा नहीं होता।-दीपंविता गीता नियोगी

(लेखक एक स्वतंत्र पत्रकार हैं और 101Reporters के सदस्य हैं, जो ग्रामीण क्षेत्र के पत्रकारों का सर्वत्र भारत में फैला नेटवर्क है।)

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